ओपेनहाइमर और भगवद्गीता-महाभारत: विज्ञान की आग और आध्यात्म की शांति का विस्फोटक मिलन.kya sach mein Mahabharat mein Parmanu Bam ka jikr hai !
क्या आप जानते हैं कि दुनिया का सबसे घातक हथियार बनाने वाले वैज्ञानिक ने प्राचीन भारतीय ग्रंथ से प्रेरणा ली? जूलियस रॉबर्ट ओपेनहाइमर, "परमाणु बम के पिता", ने जब पहला परमाणु विस्फोट देखा, तो उनके मुंह से निकला: "Now I am become Death, the destroyer of worlds." यह शब्द भगवद्गीता के एक श्लोक से सीधे लिए गए थे!
ओपेनहाइमर और भगवद्गीता: जब परमाणु विस्फोट में गूँजी कुरुक्षेत्र की प्रतिध्वनि
16 जुलाई 1945। न्यू मैक्सिको का रेगिस्तान। अंधेरी सुबह। अचानक आकाश में एक ऐसी चमक उठती है मानो सचमुच “हजार सूर्यों” ने एक साथ उदय ले लिया हो। मानव इतिहास का पहला परमाणु विस्फोट—ट्रिनिटी टेस्ट।
उस क्षण, वैज्ञानिकों की भीड़ के बीच खड़े जे. रॉबर्ट ओपेनहाइमर के मन में जो शब्द उठे, वे किसी आधुनिक वैज्ञानिक ग्रंथ से नहीं थे। वे आए थे एक प्राचीन भारतीय शास्त्र से—भगवद्गीता से:
“कालोऽस्मि लोकक्षयकृत् प्रवृद्धो…”
“Now I am become Death, the destroyer of worlds.”
यह महज़ एक उद्धरण नहीं था। यह विज्ञान और आध्यात्म के बीच एक अद्भुत, जटिल और कहीं-कहीं बेचैन कर देने वाला संवाद था।
यह ब्लॉग उसी संवाद की पड़ताल है।
ओपेनहाइमर: एक वैज्ञानिक की जिंदगी, जो दर्शन की छाया में पली
कल्पना कीजिए, एक अमीर यहूदी परिवार का बेटा, जो बचपन से किताबों में डूबा रहता है। 22 अप्रैल 1904 को न्यूयॉर्क में जन्मे जे. रॉबर्ट ओपेनहाइमर ने हार्वर्ड से रसायन शास्त्र पढ़ा, लेकिन उनका दिल भौतिकी में बस गया। कैम्ब्रिज और गॉटिंगेन में नील्स बोहर जैसे दिग्गजों से सीखा, और बर्कले में प्रोफेसर बनकर सैद्धांतिक भौतिकी की दुनिया हिला दी।
लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध ने सब बदल दिया। 1942 में मैनहट्टन प्रोजेक्ट के प्रमुख बने, जहां हजारों वैज्ञानिकों ने गुप्त रूप से परमाणु बम बनाया। 16 जुलाई 1945 को ट्रिनिटी टेस्ट – दुनिया का पहला परमाणु विस्फोट! हिरोशिमा-नागासाकी की तबाही के बाद, ओपेनहाइमर ने परमाणु नियंत्रण की लड़ाई लड़ी, लेकिन 1954 में कम्युनिस्ट आरोपों से उनकी जिंदगी उजड़ गई। 1967 में मौत से पहले, वे कहते थे: "विज्ञान ने हमें शक्ति दी, लेकिन नैतिकता नहीं।"
ओपेनहाइमर का जीवन विरोधाभासों का संगम था – शांति प्रेमी, जो विनाश रचता है। यहां आती है भगवद्गीता की भूमिका, जो उन्हें कर्तव्य की राह दिखाती थी। क्या आप जानते हैं, उन्होंने संस्कृत तक सीखी सिर्फ गीता समझने के लिए?
भगवद्गीता: महाभारत का दिल, जो सदियों से दिल जीत रहा है
महाभारत का वो हिस्सा जहां कुरुक्षेत्र पर अर्जुन हिचकिचाते हैं – रिश्तेदारों से लड़ना कौन चाहेगा? तभी कृष्ण आते हैं और 700 श्लोकों में जीवन का सार समझाते हैं: भगवद्गीता!
कर्म योग का जादू: "कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन" – काम करो, फल की चिंता मत करो।
निष्काम भाव: अलगाव से जीना, जहां सफलता-असफलता छू न सके।
धर्म की पुकार: अपना कर्तव्य निभाओ, चाहे कितना कठिन हो।
भक्ति का सहारा: ईश्वर में विश्वास, जो आंतरिक शांति देता है।
गीता ने गांधी, आइंस्टीन को प्रभावित किया, लेकिन ओपेनहाइमर के लिए ये जीवन का कम्पास बनी। महाभारत की विशाल लड़ाई में गीता वो मोती है जो नैतिक युद्ध सिखाती है। क्या प्राचीन ब्रह्मास्त्र परमाणु बम जैसा था? महाभारत कहता है: "हजार सूर्यों की चमक, धुआं का स्तंभ, जीवों का राख होना" – हैरान करने वाला समानता, है न?
वो वैज्ञानिक जो संस्कृत सीखकर गीता पढ़ता था
जे. रॉबर्ट ओपेनहाइमर – "परमाणु बम का पिता"
एक ऐसा आदमी जिसने हजारों वैज्ञानिकों को लीड किया, लेकिन अपनी डेस्क पर हमेशा रखता था... भगवद्गीता की कॉपी!
उसने संस्कृत सीखी, मूल श्लोक पढ़े, दोस्तों को गीता गिफ्ट की।
और जब दुनिया का सबसे खतरनाक हथियार तैयार हुआ, तो उसके मुंह से निकला:
"कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो..."
(गीता 11:32 – मैं काल हूँ, संसारों का विनाशक!)
ओपेनहाइमर और भगवद्गीता: एक असामान्य रिश्ता
1930 के दशक में, बर्कले में रहते हुए ओपेनहाइमर ने संस्कृत सीखी। उनके शिक्षक थे आर्थर डब्ल्यू. राइडर।
उन्होंने केवल अनुवाद पढ़कर संतोष नहीं किया—वे मूल संस्कृत में गीता समझना चाहते थे। अपने भाई को लिखे पत्र में उन्होंने भगवद्गीता को “दुनिया की सबसे सुंदर दार्शनिक कविता” कहा था।
उनकी मेज़ पर गीता की प्रति रहती थी। वे मित्रों को इसे उपहार में देते थे।
क्यों?
क्योंकि गीता उनके लिए सिर्फ धार्मिक ग्रंथ नहीं थी—वह एक दार्शनिक मार्गदर्शक थी।
भगवद्गीता का संदर्भ: कुरुक्षेत्र की दुविधा
महाभारत के युद्धक्षेत्र में अर्जुन खड़े हैं। सामने अपने ही गुरु, रिश्तेदार और मित्र। धनुष हाथ से छूट जाता है। वे कहते हैं—“मैं यह युद्ध नहीं कर सकता।”
तब श्रीकृष्ण उन्हें जीवन, कर्म और धर्म का उपदेश देते हैं।
गीता के कुछ प्रमुख सिद्धांत:
- कर्मयोग – कर्म करो, फल की चिंता मत करो।
- निष्काम भाव – परिणाम से आसक्ति छोड़ो।
- स्वधर्म – अपना कर्तव्य निभाना ही धर्म है।
- विराट रूप – मृत्यु और विनाश भी ब्रह्मांडीय व्यवस्था का हिस्सा हैं।
यही वह दर्शन था जिसने ओपेनहाइमर को गहराई से प्रभावित किया।
ट्रिनिटी टेस्ट: “हजार सूर्यों” की छवि
जब पहला परमाणु विस्फोट हुआ, ओपेनहाइमर ने बाद में बताया कि उनके मन में गीता का श्लोक गूंजा:
“यदि सहस्र सूर्य एक साथ आकाश में उदित हो जाएँ, तो उनकी आभा उस महान रूप के समान होगी…” (गीता 11:12)
और फिर:
“कालोऽस्मि लोकक्षयकृत् प्रवृद्धो…” (गीता 11:32)
यह श्लोक उस क्षण का है जब कृष्ण अर्जुन को अपना विराट रूप दिखाते हैं—एक ऐसा रूप जिसमें सृष्टि और विनाश दोनों समाहित हैं।
ओपेनहाइमर ने उस विस्फोट में शायद वही विराटता देखी—सृजन की चरम वैज्ञानिक उपलब्धि और विनाश की चरम संभावना, एक साथ।
क्या गीता ने उन्हें नैतिक सांत्वना दी?
यह प्रश्न सरल नहीं है।
कुछ विद्वानों का मानना है कि गीता ने ओपेनहाइमर को यह सोचने में मदद की कि वे “माध्यम” मात्र हैं—इतिहास और युद्ध की परिस्थितियाँ उन्हें उस भूमिका तक ले आई थीं।
वे कहते थे:
“यदि हम यह बम नहीं बनाते, तो कोई और बनाता।”
यह सोच गीता के उस विचार से मिलती-जुलती है कि ब्रह्मांडीय व्यवस्था में व्यक्ति एक उपकरण (instrument) है।
पर क्या इससे नैतिक जिम्मेदारी समाप्त हो जाती है?
युद्ध के बाद, हिरोशिमा और नागासाकी की त्रासदी देखने के बाद, ओपेनहाइमर ने परमाणु हथियारों के अंतरराष्ट्रीय नियंत्रण की वकालत की। उन्होंने हाइड्रोजन बम के विकास का विरोध किया।
यह संकेत देता है कि भीतर की दुविधा कभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई।
ब्रह्मास्त्र और परमाणु बम: तुलना कितनी उचित?
अक्सर लोग महाभारत के “ब्रह्मास्त्र” की तुलना परमाणु बम से करते हैं। ग्रंथों में वर्णन मिलता है—अत्यंत तेज प्रकाश, भयंकर ताप, व्यापक विनाश।
परंतु यह तुलना प्रतीकात्मक अधिक है, ऐतिहासिक या वैज्ञानिक प्रमाण नहीं।
महाभारत का वर्णन काव्यात्मक और दार्शनिक है; आधुनिक परमाणु हथियार वैज्ञानिक अनुसंधान का परिणाम।
फिर भी, यह समानता हमें एक बात सोचने पर मजबूर करती है:
मानव सभ्यता ने हमेशा शक्ति की कल्पना की है—प्रश्न यह है कि वह शक्ति किस उद्देश्य से प्रयोग होगी।
विज्ञान बनाम आध्यात्म नहीं—विज्ञान और आध्यात्म
ओपेनहाइमर की कहानी यह नहीं बताती कि विज्ञान आध्यात्म के विरुद्ध है।
बल्कि यह दिखाती है कि:
- महान वैज्ञानिक भी नैतिक प्रश्नों से जूझते हैं।
- तकनीकी उपलब्धि और नैतिक जिम्मेदारी अलग चीजें हैं।
- ज्ञान शक्ति देता है, पर दिशा नहीं—दिशा दर्शन और नैतिकता से आती है।
ओपेनहाइमर ने स्वयं कहा था:
“भौतिकी ने पाप जान लिया है।”
यह वाक्य वैज्ञानिक उपलब्धि के साथ आई नैतिक बेचैनी का संकेत है।
आज के लिए सबक
आज जब दुनिया कृत्रिम बुद्धिमत्ता, जैव-प्रौद्योगिकी और परमाणु शक्ति के नए युग में प्रवेश कर रही है, ओपेनहाइमर और गीता की कहानी पहले से अधिक प्रासंगिक हो जाती है।
- क्या हम केवल “कर सकते हैं” इसलिए कुछ करें?
- या हमें यह भी पूछना चाहिए कि “क्या हमें करना चाहिए?”
- क्या कर्तव्य केवल तकनीकी सफलता है, या मानवता की रक्षा भी?
गीता अर्जुन से कहती है—कर्म करो, पर विवेक के साथ।
ओपेनहाइमर की जिंदगी हमें बताती है—विवेक के बिना शक्ति भारी पड़ सकती है।
निष्कर्ष: कुरुक्षेत्र हर युग में है
ओपेनहाइमर कोई मिथकीय पात्र नहीं थे, पर उनकी स्थिति अर्जुन जैसी थी—कर्तव्य और करुणा के बीच खड़े।
परमाणु विस्फोट केवल विज्ञान की घटना नहीं था; वह मानव चेतना का भी विस्फोट था।
गीता और ओपेनहाइमर का मिलन हमें यह याद दिलाता है कि:
हर युग का अपना कुरुक्षेत्र होता है।
और हर युग को अपने अर्जुन और अपने नैतिक प्रश्नों का सामना करना पड़ता है।
शायद असली प्रश्न यह नहीं है कि ओपेनहाइमर सही थे या गलत।
असली प्रश्न यह है—
जब हमारे सामने शक्ति होगी,
तो क्या हमारे पास उसे संभालने का विवेक भी होगा?

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