इस कहावत का अर्थ केवल रोटी को तवे पर पलटने या सरकार बदलने तक सीमित नहीं है। इसके भीतर जीवन, राजनीति, लोकतंत्र, सामाजिक व्यवस्था और मानवीय व्यवहार से जुड़ा एक गहरा संदेश छिपा है। रोटी हो या सत्ता, पलटते रहना चाहिए! जब जनता जागती है, तो इतिहास बदलता है। एक रोटी जब समय पर नहीं पलटी जाती, तो जल जाती है। और जब सत्ता जनता की आवाज सुनना बंद कर देती है, तो लोकतंत्र की आत्मा घायल होने लगती है। जरा सोचिए ! एक गरीब मां सुबह उठती है। चूल्हा जलाती है। आटे की लोई बनाती है और तवे पर रोटी डाल देती है। कुछ देर बाद वह रोटी पलटती है, ताकि दूसरी तरफ भी ठीक से पक सके। अगर वह ऐसा न करे, तो रोटी एक तरफ से जल जाएगी और दूसरी तरफ से कच्ची रह जाएगी। यह तो रसोई की एक साधारण-सी घटना है। लेकिन इसी साधारण घटना में छिपा एक ऐसा सवाल है, जो पूरे समाज को सोचने पर मजबूर कर सकता है। जब रोटी को अच्छा बनाने के लिए पलटना जरूरी है, तो सत्ता को हमेशा के लिए एक ही हाथ में छोड़ देना सही कैसे हो सकता है? यही सवाल लोकतंत्र की बुनियाद, जनता की ताकत और सत्ता की जवाबदेही को समझने का रास्ता खोलता है। क्योंकि रोटी केवल आटे से न...