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भारत का भविष्य खतरे में? रोजगार-महंगाई छोड़ क्यों हो रही है जाति की राजनीति!

भारत में रोजगार और महंगाई की चुनौतियाँ बनी हुई हैं, लेकिन राजनीतिक दलों द्वारा जाति आधारित मुद्दों को प्रमुखता देने से विकास एजेंडे पर ध्यान कम हो रहा है। 

भारत का भविष्य दांव पर? असली मुद्दों से भटकती राजनीति का गहन विश्लेषण

प्रस्तावना: सवाल जो हमें खुद से पूछना होगा

क्या भारत का भविष्य सच में दांव पर है?
क्या हमारी राजनीति विकास, रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे असली मुद्दों से भटक चुकी है?
या यह केवल एक धारणा है जिसे सोशल मीडिया और टीवी डिबेट्स ने मजबूत कर दिया है?

आज जब भारत 21वीं सदी में खुद को विश्व शक्ति के रूप में स्थापित करने की दिशा में बढ़ रहा है, तब यह प्रश्न और भी प्रासंगिक हो जाता है।

दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी वाला देश है।
की रिपोर्टों के अनुसार, आने वाले दशकों में भारत की जनसंख्या और कार्यबल वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित करेंगे।

लेकिन अगर राजनीति का केंद्र असली मुद्दों से हट जाए, तो क्या यह जनसांख्यिकीय लाभ (Demographic Dividend) एक बोझ में बदल सकता है?

इस विस्तृत लेख में हम इन्हीं सवालों का संतुलित, तथ्यों पर आधारित और गहन विश्लेषण करेंगे।

भाग 1: असली मुद्दे आखिर हैं क्या?

सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि “असली मुद्दे” किन्हें कहा जाए।

1. रोजगार

भारत में हर साल लाखों युवा नौकरी की तलाश में बाजार में प्रवेश करते हैं।
के आंकड़े समय-समय पर बेरोजगारी दर को लेकर बहस छेड़ते रहे हैं।

रोजगार केवल नौकरी नहीं, बल्कि सम्मान, आत्मनिर्भरता और सामाजिक स्थिरता से जुड़ा मुद्दा है।

2. महंगाई

खाद्य पदार्थों, ईंधन और रोजमर्रा की वस्तुओं की बढ़ती कीमतें आम परिवार की आर्थिक स्थिति को प्रभावित करती हैं।
महंगाई सीधे मध्यम वर्ग और गरीब वर्ग की बचत और जीवन स्तर को प्रभावित करती है।

3. शिक्षा की गुणवत्ता

और विभिन्न शिक्षा सर्वेक्षणों की रिपोर्टें बताती हैं कि स्कूलों और विश्वविद्यालयों की गुणवत्ता में असमानता बनी हुई है।

4. स्वास्थ्य

कोविड-19 महामारी ने दिखाया कि स्वास्थ्य ढांचा कितना महत्वपूर्ण है।
ने महामारी के दौरान देशों की स्वास्थ्य व्यवस्थाओं पर गंभीर टिप्पणियाँ कीं।

5. कृषि संकट

भारत की बड़ी आबादी अब भी कृषि पर निर्भर है।
की रिपोर्टें ग्रामीण आय और कृषि ऋण की चुनौतियों को उजागर करती रही हैं।

भाग 2: राजनीति का ध्यान किन मुद्दों पर केंद्रित है?

अगर हम टीवी डिबेट्स, सोशल मीडिया ट्रेंड्स और चुनावी भाषणों को देखें तो अक्सर निम्न विषय हावी रहते हैं:

  • जातीय समीकरण
  • धार्मिक ध्रुवीकरण
  • ऐतिहासिक विवाद
  • प्रतीकात्मक मुद्दे
  • व्यक्तित्व आधारित राजनीति

यह कहना गलत होगा कि विकास पर बात नहीं होती, लेकिन यह भी सच है कि भावनात्मक मुद्दे अधिक सुर्खियाँ बटोरते हैं।

भाग 3: इतिहास से सीख

भारत की राजनीति में मुद्दों का उतार-चढ़ाव नया नहीं है।

स्वतंत्रता के बाद
ने औद्योगीकरण और वैज्ञानिक सोच पर जोर दिया।

1991 में
और
द्वारा आर्थिक उदारीकरण ने भारत की दिशा बदल दी।

हाल के वर्षों में
के नेतृत्व में बुनियादी ढांचे और डिजिटल इंडिया पर जोर दिया गया।

इतिहास बताता है कि जब राजनीति विकास पर केंद्रित रही, तब देश ने छलांग लगाई।

भाग 4: असली मुद्दों से भटकाव के कारण

1. चुनावी गणित

पहले-पास्ट-द-पोस्ट प्रणाली में छोटे वोट बैंक भी निर्णायक हो सकते हैं।

2. मीडिया इकोसिस्टम

TRP आधारित बहसें जटिल आर्थिक मुद्दों से ज्यादा भावनात्मक विषयों को प्राथमिकता देती हैं।

3. सोशल मीडिया एल्गोरिदम

ध्रुवीकरण वाले कंटेंट को ज्यादा एंगेजमेंट मिलता है।

4. अल्पकालिक राजनीतिक लाभ

दीर्घकालिक सुधारों की तुलना में तात्कालिक मुद्दे ज्यादा वोट दिला सकते हैं।

भाग 5: इसके परिणाम क्या हो सकते हैं?

1. जनसांख्यिकीय लाभ का नुकसान

अगर युवाओं को रोजगार नहीं मिला, तो सामाजिक असंतोष बढ़ सकता है।

2. वैश्विक प्रतिस्पर्धा में पिछड़ना

चीन, दक्षिण कोरिया और सिंगापुर जैसे देशों ने शिक्षा और उद्योग पर ध्यान केंद्रित कर प्रगति की।

3. सामाजिक ध्रुवीकरण

असली समस्याएँ अनसुलझी रह जाती हैं जबकि समाज भावनात्मक मुद्दों में उलझ जाता है।

भाग 6: क्या सब कुछ नकारात्मक है?

नहीं।

भारत में कई सकारात्मक पहल भी हुई हैं:

  • डिजिटल भुगतान में क्रांति
  • स्टार्टअप इकोसिस्टम का विस्तार
  • इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण
  • महिला स्वयं सहायता समूहों की वृद्धि

और अन्य वित्तीय संस्थान वित्तीय समावेशन को बढ़ावा दे रहे हैं।

भाग 7: समाधान क्या हो सकते हैं?

1. मुद्दा आधारित मतदान

मतदाता को जाति-धर्म से ऊपर उठकर शिक्षा, रोजगार और स्वास्थ्य पर सवाल पूछने चाहिए।

2. नीति बहस को बढ़ावा

विश्वविद्यालयों और थिंक टैंकों को सार्वजनिक नीति पर संवाद बढ़ाना चाहिए।

3. मीडिया सुधार

गंभीर आर्थिक और सामाजिक मुद्दों पर गहन चर्चा जरूरी है।

4. नागरिक सहभागिता

लोकतंत्र केवल वोट डालने तक सीमित नहीं है।

भाग 8: युवाओं की भूमिका

भारत की 65% से अधिक आबादी युवा है।
अगर यही वर्ग नीति, स्टार्टअप, अनुसंधान और सामाजिक सुधार में सक्रिय भूमिका निभाए, तो राजनीति की दिशा भी बदलेगी।

निष्कर्ष: भविष्य हमारे हाथ में है

भारत का भविष्य दांव पर है या नहीं — यह पूरी तरह राजनीति पर निर्भर नहीं है।
यह हम नागरिकों पर भी निर्भर है।

अगर हम असली मुद्दों को प्राथमिकता देंगे, तो राजनीति भी मजबूर होगी उन्हें प्राथमिकता देने के लिए।

लोकतंत्र में नेता जनता का प्रतिबिंब होते हैं।

इसलिए असली सवाल यह नहीं है कि राजनीति भटक रही है या नहीं।
असली सवाल यह है कि क्या हम नागरिक अपने अधिकार और जिम्मेदारी को गंभीरता से निभा रहे हैं?

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