डिजिटल डिवाइड सूचना और संचार प्रौद्योगिकियों (आईसीटी) तक पहुंच, उपयोग और ज्ञान में असमानता को दर्शाता है, जो आर्थिक व सामाजिक समूहों के बीच गहरा विभाजन पैदा करता है।
डिजिटल डिवाइड: सामाजिक न्याय के सामने 21वीं सदी की सबसे बड़ी चुनौती
आज जब हम 5G, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डिजिटल इंडिया की बात करते हैं, तब एक महत्वपूर्ण सवाल हमारे सामने खड़ा होता है—
क्या सच में हर नागरिक डिजिटल क्रांति का हिस्सा है?
अगर नहीं, तो यह केवल तकनीकी समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय (Social Justice) के लिए एक गंभीर चुनौती है।
भारत में डिजिटल परिवर्तन को गति देने के लिए अभियान शुरू किया गया। इसके अंतर्गत जैसी परियोजनाओं द्वारा गाँव-गाँव इंटरनेट पहुँचाने का प्रयास हुआ। परंतु जमीनी सच्चाई यह बताती है कि डिजिटल संसाधनों तक समान पहुँच अभी भी एक सपना है।
इस लेख में हम समझेंगे—
- डिजिटल डिवाइड क्या है
- यह सामाजिक न्याय को कैसे प्रभावित करता है
- भारत में इसकी वर्तमान स्थिति
- संवैधानिक और नीतिगत आयाम
- और समाधान की संभावित दिशा
1. डिजिटल डिवाइड क्या है?
डिजिटल डिवाइड (Digital Divide) का अर्थ है—
समाज के विभिन्न वर्गों के बीच डिजिटल संसाधनों (इंटरनेट, स्मार्टफोन, कंप्यूटर, डिजिटल कौशल) की उपलब्धता और उपयोग में असमानता।
यह असमानता तीन स्तरों पर दिखाई देती है:
(1) एक्सेस डिवाइड
किसके पास इंटरनेट और डिवाइस है और किसके पास नहीं?
(2) स्किल डिवाइड
कौन डिजिटल तकनीक का उपयोग करना जानता है और कौन नहीं?
(3) यूसेज डिवाइड
कौन तकनीक का उपयोग उत्पादक कार्यों (शिक्षा, रोजगार, उद्यम) में कर रहा है और कौन केवल मनोरंजन तक सीमित है?
2. सामाजिक न्याय की अवधारणा और डिजिटल आयाम
सामाजिक न्याय का मूल उद्देश्य है—
- समान अवसर
- संसाधनों का न्यायपूर्ण वितरण
- हाशिए पर खड़े वर्गों का सशक्तिकरण
भारतीय संविधान की प्रस्तावना में “सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय” का वादा किया गया है।
के अनुच्छेद 14 (समानता), अनुच्छेद 15 (भेदभाव निषेध), और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता) डिजिटल युग में नई व्याख्या की मांग करते हैं।
आज इंटरनेट केवल सुविधा नहीं, बल्कि—
- शिक्षा का माध्यम
- रोजगार का साधन
- सरकारी सेवाओं का प्रवेशद्वार
- अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मंच
बन चुका है।
3. भारत में डिजिटल डिवाइड: वास्तविक स्थिति
(A) ग्रामीण बनाम शहरी अंतर
शहरी क्षेत्रों में उच्च गति इंटरनेट उपलब्ध है, जबकि कई ग्रामीण क्षेत्रों में नेटवर्क अस्थिर या अनुपस्थित है।
(B) लैंगिक डिजिटल गैप
ग्रामीण भारत में महिलाओं की डिजिटल पहुँच पुरुषों की तुलना में कम है।
स्मार्टफोन अक्सर परिवार के पुरुष सदस्य के नियंत्रण में रहता है।
(C) आर्थिक असमानता
गरीब परिवारों के लिए स्मार्टफोन और डेटा पैक एक अतिरिक्त खर्च है।
(D) शैक्षिक प्रभाव – COVID-19 का अनुभव
कोविड-19 के दौरान ऑनलाइन शिक्षा ने स्पष्ट कर दिया कि—
- लाखों छात्रों के पास स्मार्टफोन नहीं था
- एक फोन पर कई बच्चे पढ़ रहे थे
- नेटवर्क समस्या के कारण कक्षाएँ बाधित हुईं
यह स्थिति सामाजिक न्याय के सिद्धांत को कमजोर करती है।
4. डिजिटल डिवाइड और शिक्षा
ऑनलाइन शिक्षा प्लेटफॉर्म जैसे—
- SWAYAM
- DIKSHA
- e-Pathshala
इनका लाभ उन्हीं को मिला जिनके पास डिजिटल संसाधन थे।
परिणाम:
- निजी स्कूलों और सरकारी स्कूलों के छात्रों के बीच अंतर बढ़ा
- ग्रामीण-शहरी शैक्षिक खाई गहरी हुई
यदि शिक्षा समान अवसर का आधार है, तो डिजिटल असमानता भविष्य की सामाजिक असमानता को और बढ़ाती है।
5. डिजिटल डिवाइड और रोजगार
आज नौकरी आवेदन, स्किल ट्रेनिंग, फ्रीलांसिंग, स्टार्टअप—सब डिजिटल प्लेटफॉर्म पर आधारित हैं।
जो युवा डिजिटल कौशल से वंचित हैं, वे—
- प्रतिस्पर्धा में पीछे रह जाते हैं
- कम वेतन वाले अनौपचारिक रोजगार में फँसे रहते हैं
इससे आर्थिक न्याय प्रभावित होता है।
6. डिजिटल गवर्नेंस और सामाजिक बहिष्करण
सरकारी सेवाएँ तेजी से ऑनलाइन हो रही हैं—
- आधार आधारित प्रमाणीकरण
- ऑनलाइन राशन कार्ड
- डिजिटल भुगतान
- DBT (Direct Benefit Transfer)
यदि व्यक्ति डिजिटल रूप से साक्षर नहीं है, तो वह—
- योजनाओं का लाभ नहीं उठा पाता
- बिचौलियों पर निर्भर हो जाता है
यह सामाजिक न्याय के सिद्धांत के विरुद्ध है।
7. डिजिटल डिवाइड के कारण
- बुनियादी ढांचे की कमी
- गरीबी
- डिजिटल साक्षरता का अभाव
- लैंगिक भेदभाव
- भाषा बाधा (अंग्रेज़ी आधारित इंटरनेट सामग्री)
8. डिजिटल डिवाइड: संवैधानिक और नीतिगत दृष्टिकोण
भारत में डिजिटल सशक्तिकरण हेतु—
जैसी योजनाएँ चलाई गईं।
इनका उद्देश्य था—
- डिजिटल साक्षरता
- ग्रामीण कनेक्टिविटी
- ई-गवर्नेंस
परंतु इन योजनाओं की प्रभावशीलता राज्यों के बीच भिन्न रही है।
9. डिजिटल डिवाइड और लोकतंत्र
सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म लोकतांत्रिक भागीदारी का माध्यम बन चुके हैं।
यदि कुछ वर्ग ही डिजिटल विमर्श में भाग लेते हैं, तो—
- नीति निर्माण असंतुलित होगा
- हाशिए के वर्गों की आवाज कमजोर होगी
डिजिटल समानता लोकतांत्रिक समानता की शर्त बन चुकी है।
10. समाधान: डिजिटल न्याय की ओर
(1) सार्वभौमिक इंटरनेट अधिकार
इंटरनेट को मौलिक सेवा के रूप में मान्यता।
(2) सस्ती डिवाइस नीति
छात्रों के लिए सब्सिडी स्मार्टफोन/टैबलेट।
(3) स्थानीय भाषा में सामग्री
भारतीय भाषाओं में डिजिटल कंटेंट बढ़ाना।
(4) डिजिटल साक्षरता अभियान
स्कूल स्तर से डिजिटल शिक्षा अनिवार्य।
(5) महिला डिजिटल सशक्तिकरण कार्यक्रम
महिला स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से डिजिटल प्रशिक्षण।
11. डिजिटल डिवाइड और सामाजिक न्याय: UPSC दृष्टिकोण
UPSC के लिए यह विषय महत्वपूर्ण है क्योंकि—
- यह GS Paper II (शासन)
- GS Paper III (विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी)
- और निबंध में पूछा जा सकता है
संभावित आयाम:
- समावेशी विकास
- ई-गवर्नेंस
- डिजिटल अर्थव्यवस्था
- लैंगिक समानता
12. निष्कर्ष: क्या डिजिटल भारत, न्यायपूर्ण भारत है?
डिजिटल क्रांति तभी सार्थक है जब—
- हर नागरिक तक इंटरनेट पहुँचे
- हर हाथ में डिजिटल कौशल हो
- हर वर्ग को समान अवसर मिले
अन्यथा, डिजिटल इंडिया केवल एक नारा बनकर रह जाएगा।
सामाजिक न्याय की सच्ची परिभाषा अब केवल भूमि, शिक्षा और रोजगार तक सीमित नहीं है—
अब इसमें डिजिटल पहुँच और डिजिटल सशक्तिकरण भी शामिल है।
अंतिम संदेश
डिजिटल डिवाइड केवल तकनीकी समस्या नहीं है।
यह सामाजिक न्याय की परीक्षा है।
यदि भारत को 21वीं सदी में एक न्यायपूर्ण, समावेशी और सशक्त राष्ट्र बनना है, तो डिजिटल समानता को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी।
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