ISRO कम लागत में अंतरिक्ष मिशन इसलिए पूरा करता है क्योंकि यह स्वदेशी तकनीक, मॉड्यूलर डिज़ाइन और कुशल परीक्षणों पर जोर देता है।इसके वैज्ञानिकों की कम मजदूरी और सिमुलेशन-आधारित विकास भी खर्च घटाते हैं।
ISRO कम लागत में अंतरिक्ष मिशन कैसे पूरा करता है?
चंद्रयान मिशन से समझें भारत का “लो-कॉस्ट स्पेस मॉडल” और उसके ट्रेड-ऑफ
जब दुनिया अरबों डॉलर खर्च करके अंतरिक्ष मिशन भेजती है, तब भारत का ISRO (Indian Space Research Organisation) अपेक्षाकृत कम बजट में ऐतिहासिक उपलब्धियाँ हासिल कर लेता है।
चंद्रयान-3 की सफलता ने यह सवाल फिर से चर्चा में ला दिया — आखिर ISRO कम लागत में इतने जटिल मिशन कैसे पूरा करता है?
क्या यह केवल कम वेतन की वजह से है?
क्या गुणवत्ता से समझौता किया जाता है?
या फिर इसके पीछे एक अलग इंजीनियरिंग दर्शन काम करता है?
इस ब्लॉग पोस्ट में हम चंद्रयान मिशन को केस स्टडी बनाकर समझेंगे कि ISRO का लो-कॉस्ट मॉडल कैसे काम करता है, और इसके पीछे कौन-कौन से रणनीतिक निर्णय छिपे हैं।
चंद्रयान मिशन: लागत बनाम उपलब्धि
सबसे पहले कुछ तथ्य:
- चंद्रयान-1 (2008) – लगभग ₹386 करोड़
- चंद्रयान-3 (2023) – लगभग ₹615 करोड़
- तुलना में NASA के समान स्तर के मिशन – सैकड़ों मिलियन से अरबों डॉलर
फिर भी चंद्रयान-3 ने चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास सफल सॉफ्ट लैंडिंग की — जो अत्यंत चुनौतीपूर्ण क्षेत्र माना जाता है।
स्पष्ट है, यह “सस्ता मिशन” नहीं था — बल्कि “स्मार्ट मिशन” था।
1️⃣ फ्रूगल इंजीनियरिंग: जितना जरूरी, उतना ही
ISRO का मूल सिद्धांत है:
“Minimum Viable Mission” — लक्ष्य पूरा करने के लिए जितनी तकनीक जरूरी है, उतनी ही विकसित करो।
चंद्रयान-3 में क्या किया गया?
- नया ऑर्बिटर नहीं बनाया (चंद्रयान-2 का ऑर्बिटर पहले से काम कर रहा था)
- सीमित वैज्ञानिक उपकरण
- 14 दिन की सतही ऑपरेशन अवधि (एक चंद्र दिवस)
इससे क्या फायदा हुआ?
- कुल वजन कम
- डिजाइन सरल
- परीक्षण लागत कम
- बजट नियंत्रण में
ट्रेड-ऑफ (समझौता)
- मिशन अवधि सीमित
- चंद्र रात्रि में संचालन संभव नहीं
- वैज्ञानिक डेटा सीमित
यहाँ ISRO ने “हर कीमत पर अधिकतम फीचर” की जगह “लक्ष्य आधारित दक्षता” को चुना।
2️⃣ स्वदेशी तकनीक और आत्मनिर्भरता
ISRO अधिकांश महत्वपूर्ण तकनीक खुद विकसित करता है:
- LVM3 रॉकेट
- क्रायोजेनिक इंजन
- नेविगेशन सिस्टम
- एवियोनिक्स
इससे:
- आयात लागत कम
- विदेशी निर्भरता घटती है
- सप्लाई चेन पर नियंत्रण
ट्रेड-ऑफ
- शुरुआती विकास में अधिक समय
- अनुसंधान पर लंबी अवधि का निवेश
लेकिन एक बार तकनीक विकसित हो जाए, तो भविष्य के मिशन सस्ते हो जाते हैं।
3️⃣ कम श्रम लागत, लेकिन उच्च कौशल
भारत में वैज्ञानिकों और इंजीनियरों का वेतन पश्चिमी देशों से कम है। इससे परियोजना की कुल लागत घटती है।
लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि:
- IIT, IISc जैसे संस्थानों से प्रशिक्षित प्रतिभाएँ
- मजबूत संस्थागत संस्कृति
- मिशन-उन्मुख कार्यप्रणाली
ट्रेड-ऑफ
- निजी क्षेत्र में प्रतिभा पलायन का खतरा
- छोटे दलों पर अधिक दबाव
फिर भी ISRO की कार्यकुशलता बनी रहती है।
4️⃣ क्रमिक सुधार (Iterative Model)
चंद्रयान-2 की लैंडिंग असफल रही।
क्या ISRO ने पूरा सिस्टम बदल दिया? नहीं।
उन्होंने:
- सॉफ्टवेयर एल्गोरिद्म सुधारे
- लैंडिंग पैरों को मजबूत किया
- अतिरिक्त सेंसर जोड़े
- त्रुटि विश्लेषण कर सीमित सुधार किए
यानी “पूरा नया मिशन” नहीं, बल्कि “सुधारा हुआ मिशन”।
फायदा:
- लागत नियंत्रण
- विश्वसनीयता में वृद्धि
ट्रेड-ऑफ:
- अत्याधुनिक प्रयोग सीमित
- डिज़ाइन अपेक्षाकृत रूढ़िवादी
5️⃣ ईंधन-कुशल ट्रैजेक्टरी
ISRO सीधे चंद्रमा की ओर भारी रॉकेट नहीं भेजता। वह:
- पृथ्वी की कक्षा में प्रवेश करता है
- धीरे-धीरे कक्षा ऊँची करता है
- गुरुत्वाकर्षण सहायता का उपयोग करता है
इससे:
- छोटे रॉकेट से काम चलता है
- ईंधन की बचत
- लॉन्च लागत कम
ट्रेड-ऑफ:
- यात्रा में अधिक समय
- जटिल गणनाएँ
यहाँ समय को धन से बदला गया।
6️⃣ सीमित लेकिन प्रभावशाली वैज्ञानिक लक्ष्य
चंद्रयान-1 ने चंद्रमा पर पानी के अणुओं की पुष्टि की — एक ऐतिहासिक खोज।
ISRO मिशन “कम उपकरण, लेकिन उच्च प्रभाव” के सिद्धांत पर काम करते हैं।
ट्रेड-ऑफ:
- व्यापक वैज्ञानिक कवरेज कम
- डेटा संग्रह सीमित
लेकिन लक्षित उपलब्धि सुनिश्चित।
7️⃣ नियंत्रित जोखिम नीति
NASA जैसे एजेंसियाँ अक्सर अत्यधिक रेडंडेंसी रखती हैं — यानी हर सिस्टम का बैकअप।
ISRO:
- आवश्यक स्तर तक बैकअप रखता है
- मानव रहित मिशनों में नियंत्रित जोखिम स्वीकार करता है
ट्रेड-ऑफ:
- विफलता का थोड़ा अधिक जोखिम
- सुरक्षा स्तर सीमित
लेकिन लागत में भारी बचत।
चंद्रयान-3: लागत बनाम रणनीति सार
| घटक | लागत बचत रणनीति | ट्रेड-ऑफ |
|---|---|---|
| लॉन्च | स्वदेशी LVM3 | सीमित पेलोड |
| लैंडर | सीमित उपकरण | कम अवधि |
| रोवर | हल्का डिज़ाइन | सीमित दूरी |
| मिशन | 14 दिन | चंद्र रात्रि नहीं |
| ऑर्बिटर | पुनः उपयोग | नया मैपिंग नहीं |
| ट्रैजेक्टरी | धीमा मार्ग | लंबी यात्रा |
ISRO बनाम NASA: दर्शन का अंतर
NASA मॉडल:
“अधिकतम विज्ञान, न्यूनतम जोखिम — चाहे लागत अधिक हो।”
ISRO मॉडल:
“स्पष्ट लक्ष्य, नियंत्रित लागत, अधिकतम दक्षता।”
दोनों सही हैं — बस प्राथमिकताएँ अलग हैं।
FAQ अक्सर लोग यह भी पूछते हैं
Q1. चंद्रयान-3 की कुल लागत कितनी थी?
लगभग ₹615 करोड़।
Q2. ISRO NASA से सस्ता क्यों है?
कम श्रम लागत, सीमित मिशन दायरा, स्वदेशी तकनीक और ईंधन-कुशल रणनीति।
Q3. क्या कम लागत का मतलब कम गुणवत्ता है?
नहीं। यह दक्ष इंजीनियरिंग और स्पष्ट प्राथमिकताओं का परिणाम है।
निष्कर्ष: क्या ISRO सस्ता है या स्मार्ट?
ISRO कम लागत इसलिए नहीं है क्योंकि वह “कम गुणवत्ता” देता है।
वह कम लागत इसलिए है क्योंकि वह:
- स्पष्ट लक्ष्य तय करता है
- अनावश्यक जटिलता हटाता है
- स्वदेशी तकनीक विकसित करता है
- क्रमिक सुधार अपनाता है
- बजट अनुशासन बनाए रखता है
चंद्रयान ने साबित किया कि
अंतरिक्ष अन्वेषण केवल पैसों से नहीं, बल्कि सुविचारित इंजीनियरिंग से भी संभव है।

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