भारत में आरक्षण नीति का इतिहास: आज़ादी से पहले से अब तक का पूरा सच | फायदे, नुकसान और बड़ी बहस.Bharat mein Aarakshan Niti ka itihas kya hai
भारत में आरक्षण नीति सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने का महत्वपूर्ण साधन रही है, जिसकी जड़ें औपनिवेशिक काल में हैं। आजादी से पहले से 2025 तक यह नीति कई चरणों से गुजरी, जिसमें जातिगत और आर्थिक आधार शामिल हुए।
भारत में आरक्षण नीति का इतिहास: आज़ादी से पहले से अब तक का पूरा सच | फायदे, नुकसान और बड़ी बहस
भारत में आरक्षण नीति का इतिहास क्या है? जानिए 1902 से 2025 तक आरक्षण व्यवस्था की पूरी कहानी, संविधान के प्रावधान, मंडल आयोग, EWS आरक्षण, फायदे-नुकसान और वर्तमान विवाद।
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प्रस्तावना: आरक्षण सामाजिक न्याय या राजनीतिक मुद्दा?
भारत में आरक्षण नीति केवल एक सरकारी योजना नहीं है, बल्कि यह सामाजिक संरचना, ऐतिहासिक असमानता और लोकतांत्रिक न्याय से जुड़ा संवेदनशील विषय है।
कोई इसे “सामाजिक न्याय का सबसे बड़ा हथियार” मानता है, तो कोई “योग्यता के साथ समझौता” कहकर इसकी आलोचना करता है।
लेकिन असल सवाल यह है –
आरक्षण की शुरुआत कब और क्यों हुई?
संविधान में इसे किस आधार पर शामिल किया गया?
आज यह व्यवस्था किस रूप में लागू है?
आइए, इस पूरे इतिहास को विस्तार से समझते हैं।
1. आरक्षण की शुरुआत: आज़ादी से पहले का दौर
बहुत से लोग मानते हैं कि आरक्षण 1950 के बाद शुरू हुआ, लेकिन इसकी जड़ें ब्रिटिश काल में मिलती हैं।
(1) 1902 – कोल्हापुर के शाहू महाराज
भारत में आरक्षण का पहला प्रयोग 1902 में कोल्हापुर राज्य में हुआ।
शाहू महाराज ने पिछड़े वर्गों के लिए सरकारी नौकरियों में 50% आरक्षण लागू किया।
यह कदम सामाजिक असमानता को कम करने के लिए उठाया गया था।
(2) 1932 – पूना पैक्ट
डॉ. भीमराव अंबेडकर और महात्मा गांधी के बीच हुआ पूना पैक्ट आरक्षण के इतिहास में निर्णायक मोड़ था।
ब्रिटिश सरकार ने दलितों के लिए अलग निर्वाचक मंडल (Separate Electorates) देने की घोषणा की थी।
गांधीजी ने इसका विरोध किया।
समझौते के बाद दलितों को सामान्य निर्वाचन क्षेत्र में ही आरक्षित सीटें दी गईं।
यह व्यवस्था आगे चलकर संविधान में शामिल हुई।
2. संविधान और आरक्षण (1950)
26 जनवरी 1950 को लागू हुए भारतीय संविधान में आरक्षण को सामाजिक न्याय के सिद्धांत के तहत शामिल किया गया।
महत्वपूर्ण अनुच्छेद:
- अनुच्छेद 15(4) – सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए विशेष प्रावधान
- अनुच्छेद 16(4) – सरकारी नौकरियों में पिछड़े वर्गों को आरक्षण
- अनुच्छेद 330-342 – अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षण
संविधान निर्माताओं ने आरक्षण को शुरू में 10 वर्षों के लिए अस्थायी प्रावधान माना था, लेकिन समय-समय पर इसे बढ़ाया गया।
3. मंडल आयोग और OBC आरक्षण (1979–1990)
आरक्षण का सबसे बड़ा मोड़ 1979 में आया।
मंडल आयोग की स्थापना
प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ( जनता पार्टी जो बाद में चलकर भारतीय जनता पार्टी बनी) ने बी.पी. मंडल की अध्यक्षता में आयोग गठित किया।
प्रमुख सिफारिशें:
- OBC को 27% आरक्षण
- कुल आरक्षण सीमा 50% से अधिक न हो
1990 – वी.पी. सिंह सरकार जो बीजेपी के समर्थन से थी
मंडल आयोग की सिफारिशें लागू की गईं।
देशभर में भारी विरोध और प्रदर्शन हुए।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट (Indra Sawhney Case, 1992) ने OBC आरक्षण को मान्यता दी और 50% सीमा तय की।
4. 93वां संविधान संशोधन (2005)
इस संशोधन के तहत निजी सहायता प्राप्त शैक्षणिक संस्थानों में भी आरक्षण लागू किया गया।
5. आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) आरक्षण – 2019
2019 में 103वां संविधान संशोधन हुआ।
- सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को 10% आरक्षण
- आय सीमा निर्धारित की गई
यह पहली बार था जब आरक्षण केवल आर्थिक आधार पर दिया गया।
2022 में सुप्रीम कोर्ट ने इसे वैध ठहराया।
6. वर्तमान आरक्षण संरचना (2025 तक)
केंद्र सरकार के तहत:
- SC – 15%
- ST – 7.5%
- OBC – 27%
- EWS – 10%
कुल मिलाकर 59.5% आरक्षण
कुछ राज्यों (जैसे तमिलनाडु) में यह 69% तक है।
7. आरक्षण के फायदे
(1) सामाजिक न्याय
सदियों से वंचित वर्गों को अवसर मिला।
(2) शिक्षा में प्रतिनिधित्व बढ़ा
IIT, IIM और विश्वविद्यालयों में SC/ST/OBC छात्रों की संख्या बढ़ी।
(3) सरकारी नौकरियों में भागीदारी
पहले जो वर्ग पूरी तरह बाहर थे, अब प्रशासनिक सेवाओं में दिखाई देते हैं।
(4) सामाजिक आत्मविश्वास
आरक्षण ने सामाजिक सम्मान और पहचान दी।
8. आरक्षण के नुकसान और आलोचनाएं
(1) मेरिट पर सवाल
आलोचक कहते हैं कि इससे प्रतिस्पर्धा प्रभावित होती है।
(2) क्रीमी लेयर विवाद
OBC में आर्थिक रूप से मजबूत वर्ग भी लाभ ले लेते हैं।
(3) राजनीतिक उपयोग
चुनाव के समय आरक्षण मुद्दा बन जाता है।
(4) जातिवाद को बढ़ावा?
कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि इससे जाति पहचान और मजबूत होती है।
9. सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसले
- Indra Sawhney Case (1992)
- Nagaraj Case (2006)
- EWS Case (2022)
इन फैसलों ने आरक्षण की सीमा, क्रीमी लेयर और प्रमोशन में आरक्षण को स्पष्ट किया।
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10. क्या आरक्षण हमेशा रहेगा?
संविधान में SC/ST के लिए राजनीतिक आरक्षण को हर 10 साल में बढ़ाया गया है।
सवाल यह है कि:
- क्या सामाजिक समानता प्राप्त हो चुकी है?
- क्या आर्थिक आधार ही पर्याप्त है?
- क्या भविष्य में आरक्षण मॉडल बदलेगा?
11. विशेषज्ञों की राय
समर्थन में:
- ऐतिहासिक अन्याय की भरपाई
- सामाजिक संतुलन
विरोध में:
- आर्थिक आधार को प्राथमिकता
- सीमित समय सीमा तय हो
12. निष्कर्ष: संतुलन की आवश्यकता
आरक्षण नीति भारत की सामाजिक संरचना से जुड़ी जटिल व्यवस्था है।
यह न तो पूरी तरह गलत है, न ही पूर्ण समाधान।
ज़रूरत है:
- पारदर्शिता
- क्रीमी लेयर सख्ती
- समय-समय पर समीक्षा
FAQ अक्सर लोग यह भी पूछते हैं
Q1. भारत में आरक्षण की शुरुआत कब हुई?
1902 में कोल्हापुर से।
Q2. मंडल आयोग कब लागू हुआ?
1990 में।
Q3. वर्तमान में कुल आरक्षण कितना है?
केंद्र में 59.5%
Q4. क्या आरक्षण केवल जाति पर आधारित है?
नहीं, अब आर्थिक आधार (EWS) भी शामिल है।
अंतिम शब्द
आरक्षण केवल नीति नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का प्रयास है।
जब तक समान अवसर वास्तविक रूप में नहीं मिलते, यह बहस जारी रहेगी
डिस्क्लेमर:
यह लेख शिक्षा नीति और सामाजिक मुद्दों पर आधारित विश्लेषण है। यह लेख शिक्षा सुधार, सरकारी नीतियों और सामाजिक परिवर्तन से जुड़े विषयों पर आधारित हैं। यह लेख किसी राजनीतिक पार्टी या सामाजिक समूह से जुड़ा हुआ नहीं है।
लेखक :पंकज कुमार
मै शिक्षा नीति, सरकारी योजनाओं और समसामयिक सामाजिक मुद्दों पर आधारित लेखन करते हैं। वे जटिल विषयों को सरल और स्पष्ट भाषा में समझाने के लिए जाने जाते हैं। उनका उद्देश्य पाठकों को संतुलित, तथ्यात्मक और विश्वसनीय जानकारी उपलब्ध कराना है।

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