यह अधिनियम 1978 में पारित हुआ, जब इंदिरा गांधी की सरकार के बाद मोरारजी देसाई की जनता सरकार सत्ता में आई। आपातकाल के दौरान मौलिक अधिकारों का निलंबन और कार्यपालिका का दुरुपयोग हुआ था, जिसे सुधारने के लिए यह कदम उठाया गया।
44वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1978: आपातकाल के बाद लोकतंत्र की पुनर्स्थापना
44वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 का मुख्य उद्देश्य 1975–77 के आपातकाल के दौरान हुए संवैधानिक विकृतियों को सुधारना और लोकतांत्रिक संतुलन को पुनः स्थापित करना था। विशेष रूप से, इस संशोधन ने 42वें संविधान संशोधन (1976) द्वारा बढ़ाई गई कार्यपालिका की शक्तियों और मौलिक अधिकारों पर लगाए गए प्रतिबंधों को संतुलित किया।
इसे भारतीय लोकतंत्र की “सुधारात्मक प्रतिक्रिया” भी कहा जाता है।
पृष्ठभूमि: 44वें संशोधन की आवश्यकता क्यों पड़ी?
25 जून 1975 को अनुच्छेद 352 के तहत “आंतरिक आपातकाल” घोषित किया गया। इस दौरान:
- मौलिक अधिकारों को निलंबित किया गया।
- प्रेस की स्वतंत्रता पर रोक लगी।
- विपक्षी नेताओं को गिरफ्तार किया गया।
- न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) कमजोर हुई।
- लोकसभा का कार्यकाल 5 से बढ़ाकर 6 वर्ष किया गया (42वें संशोधन द्वारा)।
- कार्यपालिका (Executive) की शक्तियाँ अत्यधिक बढ़ गईं।
इन परिस्थितियों ने लोकतंत्र की बुनियादी संरचना को चुनौती दी। 1977 में नई सरकार बनने के बाद, 44वाँ संशोधन लाया गया ताकि संविधान को उसके मूल लोकतांत्रिक स्वरूप में लौटाया जा सके।
44वें संशोधन के मुख्य उद्देश्य
- आपातकाल की शक्तियों पर नियंत्रण
- मौलिक अधिकारों की रक्षा
- न्यायपालिका की स्वतंत्रता की पुनर्स्थापना
- लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व को मजबूत करना
- 42वें संशोधन की अतिरेकताओं को सुधारना
1. आपातकाल की घोषणा पर कठोर शर्तें (अनुच्छेद 352)
🔹 (क) “आंतरिक अशांति” के स्थान पर “सशस्त्र विद्रोह”
पहले:
- “आंतरिक अशांति” (Internal Disturbance) जैसे व्यापक और अस्पष्ट शब्द के आधार पर आपातकाल लगाया जा सकता था।
बाद में (44वाँ संशोधन):
- इस शब्द को हटाकर “सशस्त्र विद्रोह” (Armed Rebellion) किया गया।
- अब केवल राजनीतिक अस्थिरता या विरोध के आधार पर आपातकाल घोषित नहीं किया जा सकता।
यह एक बड़ा और महत्वपूर्ण सुधार था।
🔹 (ख) मंत्रिमंडल की लिखित सलाह अनिवार्य
पहले:
- प्रधानमंत्री की मौखिक सलाह पर भी राष्ट्रपति आपातकाल घोषित कर सकते थे।
अब:
- राष्ट्रपति केवल मंत्रिमंडल की लिखित सलाह पर ही आपातकाल घोषित कर सकते हैं।
- इससे सामूहिक उत्तरदायित्व सुनिश्चित हुआ।
🔹 (ग) संसद की मंजूरी एक महीने के भीतर
पहले:
- दो महीने के भीतर मंजूरी आवश्यक थी।
अब:
- एक महीने के भीतर दोनों सदनों से विशेष बहुमत द्वारा स्वीकृति आवश्यक है।
- लोकसभा साधारण बहुमत से आपातकाल समाप्त कर सकती है।
इससे संसद का नियंत्रण मजबूत हुआ।
2. मौलिक अधिकारों की सुरक्षा
आपातकाल के दौरान अनुच्छेद 359 के तहत कई मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए थे, यहाँ तक कि जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार भी।
🔹 अनुच्छेद 20 और 21 अब निलंबित नहीं किए जा सकते
44वें संशोधन के बाद:
- अनुच्छेद 20 (अपराधों के संबंध में संरक्षण)
- अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार)
को आपातकाल के दौरान भी निलंबित नहीं किया जा सकता।
यह संशोधन सुप्रीम कोर्ट के ADM जबलपुर मामला (1976) के निर्णय के बाद लाया गया, जिसमें कहा गया था कि आपातकाल में हैबियस कॉर्पस का अधिकार उपलब्ध नहीं होगा।
44वें संशोधन ने सुनिश्चित किया कि भविष्य में जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार कभी पूर्णतः समाप्त न हो सके।
3. लोकतांत्रिक संरचना की पुनर्स्थापना
🔹 (क) लोकसभा और विधानसभा का कार्यकाल पुनः 5 वर्ष
42वें संशोधन द्वारा कार्यकाल 6 वर्ष किया गया था।
44वें संशोधन ने:
- इसे फिर से 5 वर्ष कर दिया।
इससे जनता के प्रति जवाबदेही पुनः स्थापित हुई।
🔹 (ख) संपत्ति का अधिकार अब मौलिक अधिकार नहीं
पहले:
- संपत्ति का अधिकार (अनुच्छेद 31) मौलिक अधिकार था।
अब:
- इसे हटाकर अनुच्छेद 300A के तहत कानूनी अधिकार बनाया गया।
उद्देश्य:
- भूमि सुधार जैसे सामाजिक न्याय कार्यक्रमों को सरल बनाना।
- न्यायालयों में अत्यधिक विवादों को कम करना।
4. न्यायिक समीक्षा की पुनर्स्थापना
42वें संशोधन ने न्यायपालिका की शक्तियों को सीमित करने का प्रयास किया था।
44वें संशोधन ने:
- न्यायपालिका की स्वतंत्रता को पुनः मजबूत किया।
- संसद और सुप्रीम कोर्ट के बीच संतुलन बहाल किया।
- मूल संरचना सिद्धांत (Basic Structure Doctrine) के महत्व को अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन दिया।
5. निवारक निरोध (Preventive Detention) में सुधार
आपातकाल में निवारक निरोध का दुरुपयोग हुआ था।
44वें संशोधन ने:
- निरोध की अवधि और प्रक्रिया पर अधिक नियंत्रण लगाया।
- सलाहकार बोर्ड की समीक्षा को मजबूत किया।
हालाँकि यह व्यवस्था बनी रही, परंतु दुरुपयोग कठिन हो गया।
42वें और 44वें संशोधन की तुलना
| 42वाँ संशोधन (आपातकाल के दौरान) | 44वाँ संशोधन (सुधारात्मक कदम) |
|---|---|
| लोकसभा का कार्यकाल 6 वर्ष | पुनः 5 वर्ष |
| “आंतरिक अशांति” पर आपातकाल | “सशस्त्र विद्रोह” की शर्त |
| अधिकांश मौलिक अधिकार निलंबित | अनुच्छेद 20 व 21 सुरक्षित |
| कार्यपालिका की शक्ति अधिक | संसद व न्यायपालिका का संतुलन |
| नागरिक स्वतंत्रता सीमित | नागरिक अधिकारों की पुनर्स्थापना |
संवैधानिक महत्व
44वाँ संशोधन भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक मील का पत्थर है। यह दर्शाता है कि:
- लोकतंत्र आत्म-सुधार करने में सक्षम है।
- संविधान केवल दस्तावेज नहीं, बल्कि जीवंत व्यवस्था है।
- संकट के समय भी नागरिक अधिकार सर्वोपरि हैं।
इस संशोधन ने यह सुनिश्चित किया कि:
भविष्य में कोई भी सरकार आपातकाल की आड़ में नागरिकों के जीवन और स्वतंत्रता को पूर्णतः समाप्त न कर सके।
निष्कर्ष
44वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 आपातकाल के बाद भारतीय लोकतंत्र की पुनर्स्थापना का प्रतीक है। इसने कार्यपालिका की असीमित शक्तियों पर नियंत्रण लगाया, मौलिक अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित की और संसद तथा न्यायपालिका के बीच संतुलन बहाल किया।
यह संशोधन हमें याद दिलाता है कि संविधान की मूल भावना — स्वतंत्रता, समानता और न्याय — किसी भी परिस्थिति में कमजोर नहीं होनी चाहिए।
भारतीय संवैधानिक इतिहास में 44वाँ संशोधन लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा का एक सशक्त उदाहरण है।
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