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संविधान में राम-कृष्ण की तस्वीर क्यों? इतिहास का छुपा हुआ सच,sanvidhan ke pahle panne per kiska photo hai

क्या आपने कभी सोचा है कि भारत का संविधान – जो दुनिया का सबसे लंबा लिखित संविधान है – सिर्फ कानूनों का संग्रह नहीं, बल्कि हमारी सनातन सभ्यता का जीवंत दर्पण भी है? आजकल सोशल मीडिया पर एक सवाल खूब वायरल होता है: “संविधान में राम-कृष्ण की तस्वीर क्यों लगाई गई? 

संविधान में राम-कृष्ण की तस्वीर क्यों? इतिहास, कला और भारतीयता का गहरा संवाद


संविधान में राम-कृष्ण की तस्वीर क्यों? इतिहास, कला और भारतीयता का गहरा संवा

नमस्कार दोस्तों,: इस लेख को लोगों के साथ शेयर जरूर करें। 

जब हम की बात करते हैं, तो अक्सर अनुच्छेद, संशोधन, मौलिक अधिकार और सुप्रीम कोर्ट की व्याख्याएँ याद आती हैं। लेकिन क्या आपने कभी उस मूल हस्तलिखित प्रति को देखा है, जो 26 जनवरी 1950 को लागू हुई थी?

वह सिर्फ कानूनों की किताब नहीं थी — वह भारतीय सभ्यता की एक कलात्मक यात्रा थी। उसमें 22 सुंदर चित्र (miniatures) बनाए गए थे, जिनमें राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर, अकबर, शिवाजी, रानी लक्ष्मीबाई, गुरु गोबिंद सिंह, गांधी और सुभाष चंद्र बोस जैसे प्रतीक शामिल थे।

आज सोशल मीडिया पर एक सवाल बार-बार उठता है —
“संविधान में राम-कृष्ण की तस्वीर क्यों? क्या यह सेकुलरिज्म के खिलाफ है?”

इस विस्तृत लेख में हम पूरे ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और संवैधानिक संदर्भ के साथ इस प्रश्न का उत्तर समझेंगे। यह लेख गहराई से शोध आधारित, मौलिक और संतुलित विश्लेषण प्रस्तुत करता है।


 संविधान की मूल प्रति: एक कानूनी दस्तावेज से बढ़कर

26 जनवरी 1950 को भारत गणराज्य बना। लेकिन उस दिन जो संविधान लागू हुआ, वह टाइप की हुई सामान्य पुस्तक नहीं थी।

✍️ हस्तलिखित कला

संविधान की अंग्रेज़ी प्रति को प्रसिद्ध कैलिग्राफर ने हाथ से लिखा।

  • 6 महीने का समय
  • 432 निब्स का उपयोग
  • कोई शुल्क नहीं लिया — सिर्फ हर पृष्ठ पर अपना नाम लिखने की अनुमति मांगी

यह अपने आप में एक ऐतिहासिक उदाहरण है — राष्ट्र निर्माण में व्यक्तिगत समर्पण का।


 चित्रों के पीछे की कला: नंदलाल बोस और शांतिनिकेतन

संविधान के प्रत्येक भाग की शुरुआत में एक पूर्ण-पृष्ठ चित्र बनाया गया था। इन चित्रों का निर्देशन किया था प्रसिद्ध कलाकार:

वे शांतिनिकेतन के कला भवन के प्रमुख थे।

  • वे गुरुदेव के शिष्य थे।
  • उन्होंने भारतीय कला को आधुनिक राष्ट्रीय पहचान दी।
  • उनके साथ बियोहर राममनोहर सिन्हा और दिनानाथ भार्गव जैसे कलाकार भी जुड़े।

इन चित्रों का उद्देश्य धार्मिक प्रचार नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की निरंतरता दिखाना था — सिंधु घाटी से लेकर स्वतंत्रता आंदोलन तक।


 भाग III – मौलिक अधिकार और राम का चित्र

संविधान के भाग III (Fundamental Rights) की शुरुआत एक विशेष चित्र से होती है:

भगवान राम, सीता और लक्ष्मण पुष्पक विमान में अयोध्या लौटते हुए।

यह चित्र किस ग्रंथ से जुड़ा है?

इसका प्रतीकात्मक अर्थ

राम को “मर्यादा पुरुषोत्तम” कहा जाता है।
वे न्याय, सत्य और समानता के प्रतीक हैं।

मौलिक अधिकार क्या कहते हैं?

  • अनुच्छेद 14 – समानता
  • अनुच्छेद 15 – भेदभाव का निषेध
  • अनुच्छेद 21 – जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार

राम का चित्र “अधर्म पर धर्म की विजय” का प्रतीक है।
800 वर्षों की गुलामी के बाद भारतीयों को पहली बार पूर्ण नागरिक अधिकार मिले — ठीक वैसे ही जैसे राम ने रावण के अत्याचार से मुक्ति दिलाई।

यह धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि न्याय और नैतिक शासन का रूपक है।


 भाग IV – निदेशक सिद्धांत और कृष्ण-अर्जुन

भाग IV की शुरुआत एक और महत्वपूर्ण चित्र से होती है:

अर्जुन को गीता का उपदेश देते हुए।

यह दृश्य किस ग्रंथ से लिया गया है?

और विशेष रूप से

इसका संवैधानिक अर्थ

Directive Principles (राज्य नीति के निदेशक सिद्धांत) राज्य को निर्देश देते हैं:

  • गरीबी हटाओ
  • शिक्षा दो
  • स्वास्थ्य सुधारो
  • समान वेतन
  • पर्यावरण संरक्षण

गीता का संदेश:
“योगस्थः कुरु कर्माणि” — कर्तव्य करो, फल की चिंता मत करो।

राज्य भी ऐसा ही करे — लोककल्याण के लिए कार्य करे, भले राजनीतिक लाभ हो या न हो।

कृष्ण यहाँ मार्गदर्शक हैं, अर्जुन दुविधा में मानव समाज का प्रतीक।


 क्या यह धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ है?

भारत का संविधान “सेकुलर” है।
हालांकि “सेकुलर” शब्द 1976 में 42वें संशोधन द्वारा जोड़ा गया, पर मूल भावना 1950 से ही थी।

सेकुलरिज्म का अर्थ:

  • सभी धर्मों का समान सम्मान
  • राज्य का किसी एक धर्म से पक्षपात न करना

संविधान के 22 चित्रों में शामिल हैं:

  • बुद्ध
  • महावीर
  • अकबर
  • गुरु गोबिंद सिंह
  • गांधी
  • सुभाष बोस
  • रानी लक्ष्मीबाई
  • शिवाजी

इससे स्पष्ट है — यह धार्मिक वर्चस्व नहीं, सांस्कृतिक समावेशन है।


 संविधान सभा की भूमिका

संविधान निर्माण में प्रमुख भूमिका थी:

  • प्रारूप समिति के अध्यक्ष
  • अंतिम मसौदा प्रस्तुत किया
  • उद्देशिका प्रस्ताव (Objectives Resolution) प्रस्तुत किया
  • नंदलाल बोस को कला निर्देशन के लिए चुना

संविधान सभा में इन चित्रों का विरोध दर्ज नहीं हुआ।
यह दर्शाता है कि उस समय इन्हें सांस्कृतिक प्रतीक के रूप में स्वीकार किया गया।


 22 चित्रों का सांस्कृतिक प्रवाह

संविधान के चित्रों की यात्रा इस प्रकार है:

  1. अशोक स्तंभ
  2. सिंधु सभ्यता
  3. वैदिक आश्रम
  4. राम
  5. कृष्ण
  6. बुद्ध
  7. मौर्य काल
  8. गुप्त काल
  9. मध्यकाल
  10. अकबर
  11. शिवाजी
  12. रानी लक्ष्मीबाई
  13. गांधी
  14. सुभाष बोस
  15. गुरु गोबिंद सिंह

यह एक सभ्यतागत टाइमलाइन है — धर्म प्रचार नहीं।


 आधुनिक विवाद और गलतफहमियाँ

आज कई लोग पूछते हैं —
“अगर संविधान सेकुलर है तो राम-कृष्ण क्यों?”

लेकिन प्रश्न होना चाहिए:
“क्या सांस्कृतिक प्रतीक धर्म प्रचार हैं?”

संविधान में कहीं भी पूजा या धार्मिक आदेश नहीं दिए गए।
चित्र सिर्फ प्रतीकात्मक हैं — जैसे न्यायालय में अशोक स्तंभ।


 भारतीयता और संवैधानिक मूल्यों का संगम

भारतीय संविधान पश्चिमी मॉडल से प्रेरित जरूर है (ब्रिटेन, अमेरिका, आयरलैंड आदि), लेकिन इसकी आत्मा भारतीय है।

राम — न्याय
कृष्ण — कर्तव्य
बुद्ध — करुणा
गांधी — अहिंसा
अंबेडकर — सामाजिक न्याय

ये सब मिलकर संविधान की आत्मा बनाते हैं।


 FAQ  अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Q1. क्या संविधान की हर कॉपी में ये चित्र हैं?
नहीं, केवल मूल हस्तलिखित प्रति में। प्रिंटेड संस्करण में नहीं।

Q2. क्या अंबेडकर ने इन्हें हटाने की कोशिश की?
ऐसा कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं।

Q3. क्या यह सांप्रदायिकता है?
नहीं, क्योंकि सभी धर्मों और कालखंडों के प्रतीक शामिल हैं।

Q4. क्या संसद में मूल प्रति देखी जा सकती है?
हाँ, संसद पुस्तकालय में सुरक्षित है।


 निष्कर्ष: “छुपा हुआ सच” क्या है?

सच यह है कि संविधान ने भारत को उसकी जड़ों से काटकर नहीं बनाया।
बल्कि 5000 वर्षों की सांस्कृतिक चेतना को आधुनिक लोकतांत्रिक ढांचे में ढाला।

राम और कृष्ण की उपस्थिति धर्म का प्रचार नहीं, बल्कि मूल्यों का प्रतिनिधित्व है।

भारतीय संविधान केवल कानून नहीं —
यह सभ्यता, संस्कृति और आधुनिकता का संगम है।


 अंतिम संदेश

अगली बार जब कोई पूछे —
“संविधान में राम-कृष्ण क्यों?”

तो आप कह सकते हैं:
क्योंकि संविधान भारत की आत्मा का दर्पण है —
और भारत की आत्मा विविधता में एकता है।

जय हिंद!

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