समुद्रगुप्त की दिग्विजय नीति ने प्राचीन भारत में शक्ति संतुलन स्थापित किया, जबकि वर्तमान भारत की विदेश नीति बहु-संरेखण के माध्यम से वैश्विक शक्ति संतुलन बनाए रखती है। दोनों में शक्ति प्रदर्शन और कूटनीतिक संयम का शाश्वत सिद्धांत झलकता है।
समुद्रगुप्त की दिग्विजय नीति बनाम वर्तमान भारत की विदेश नीति: शक्ति संतुलन का शाश्वत सिद्धांत
प्रस्तावना: जब इतिहास वर्तमान से संवाद करता है
कल्पना कीजिए…
चौथी शताब्दी का भारत। गुप्त साम्राज्य अपने उत्कर्ष की ओर अग्रसर है। एक युवा, साहसी और रणनीतिक सम्राट—समुद्रगुप्त—अपने साम्राज्य का विस्तार कर रहा है।
अब समय बदलिए…
इक्कीसवीं सदी का भारत। एक लोकतांत्रिक गणराज्य, जो अमेरिका, रूस, चीन, यूरोप, जापान और इंडो-पैसिफिक के बीच संतुलन बनाते हुए अपनी विदेश नीति को आगे बढ़ा रहा है।
दोनों कालखंड अलग हैं। शासन प्रणाली अलग है। वैश्विक व्यवस्था अलग है।
लेकिन एक चीज समान है—शक्ति संतुलन (Balance of Power) की रणनीति।
यह लेख समुद्रगुप्त की दिग्विजय नीति और वर्तमान भारत की कूटनीतिक विदेश नीति में शक्ति संतुलन के सिद्धांत की गहराई से तुलना करता है—UPSC Mains शैली में।
1: समुद्रगुप्त की दिग्विजय नीति – एक रणनीतिक साम्राज्यवाद
1. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
समुद्रगुप्त (335–375 ई.) गुप्त वंश के महानतम शासक माने जाते हैं। इलाहाबाद स्तंभ प्रशस्ति (प्रयाग प्रशस्ति), जिसे हरिषेण ने लिखा, हमें उनकी विजय नीति की विस्तृत जानकारी देती है।
उन्हें “भारत का नेपोलियन” कहा गया, लेकिन यह तुलना अधूरी है—क्योंकि समुद्रगुप्त केवल विजेता नहीं थे, बल्कि कुशल कूटनीतिज्ञ भी थे।
2. दिग्विजय नीति की प्रमुख विशेषताएँ
(1) आर्यावर्त की नीति – पूर्ण विलय
उत्तर भारत के राज्यों को उन्होंने पराजित कर सीधे साम्राज्य में मिला लिया।
यह शक्ति के केंद्रीकरण का उदाहरण था।
यहाँ उन्होंने सीधी शक्ति (Hard Power) का प्रयोग किया।
(2) दक्षिणापथ नीति – अधीनता पर आधारित स्वायत्तता
दक्षिण भारत के राज्यों को हराया, लेकिन उन्हें पुनः शासन सौंप दिया। उनसे कर, उपहार और निष्ठा की अपेक्षा की।
यहाँ समुद्रगुप्त ने प्रत्यक्ष नियंत्रण की जगह संतुलित अधीनता अपनाई।
(3) सीमांत राज्यों से मैत्री
नेपाल, असम, बंगाल, श्रीलंका आदि राज्यों ने उनकी अधीनता स्वीकार की, लेकिन वे स्वतंत्र बने रहे।
यह स्पष्ट रूप से एक प्रकार का प्राचीन शक्ति संतुलन मॉडल था—जहाँ सीमांत राज्यों को बफर (Buffer States) के रूप में रखा गया।
3. दिग्विजय और शक्ति संतुलन का सिद्धांत
समुद्रगुप्त की नीति को यदि आधुनिक अंतरराष्ट्रीय संबंध सिद्धांतों से देखें तो:
| तत्व | समुद्रगुप्त की नीति |
|---|---|
| शक्ति का प्रदर्शन | सैन्य विजय |
| शक्ति का संतुलन | बफर राज्य |
| अधीनता बनाम विलय | क्षेत्र के अनुसार भिन्न रणनीति |
| प्रभुत्व | साम्राज्यिक केंद्रीकरण |
उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि कोई प्रतिद्वंद्वी शक्ति उत्तर भारत में उभर न सके।
दक्षिण में सीधा नियंत्रण न रखकर उन्होंने संसाधनों का संतुलित उपयोग किया।
2: शक्ति संतुलन सिद्धांत (Balance of Power Theory)
1. सिद्धांत का मूल अर्थ
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में शक्ति संतुलन का अर्थ है—
कोई एक राष्ट्र इतना शक्तिशाली न हो जाए कि वह पूरे क्षेत्र या विश्व पर प्रभुत्व स्थापित कर सके।
प्रमुख विचारक:
- हैंस मॉर्गेंथाऊ (Realism)
- केनेथ वाल्ट्ज (Neorealism)
2. शक्ति संतुलन के प्रकार
- आंतरिक संतुलन – अपनी सैन्य/आर्थिक शक्ति बढ़ाना
- बाह्य संतुलन – गठबंधन बनाना
- बफर राज्य – मध्यस्थ राज्यों का निर्माण
- कूटनीतिक संतुलन – सभी से संबंध बनाए रखना
यदि ध्यान दें—समुद्रगुप्त इन सभी का प्रयोग करते दिखते हैं।
3: वर्तमान भारत की विदेश नीति 21वीं सदी का संतुलन
अब आइए वर्तमान भारत की विदेश नीति पर।
1. बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था
आज विश्व में अमेरिका, चीन, रूस, यूरोप, भारत, जापान आदि शक्तियाँ हैं।
भारत की नीति स्पष्ट है—Non-Alignment 2.0 या Multi-Alignment।
2. उदाहरणों के माध्यम से समझें
(1) QUAD में भागीदारी
भारत अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया के साथ इंडो-पैसिफिक में चीन को संतुलित कर रहा है।
यह बाह्य शक्ति संतुलन है।
(2) रूस से रक्षा समझौते
S-400 मिसाइल सिस्टम की खरीद—
यह दिखाता है कि भारत पश्चिम के दबाव के बावजूद रूस से संबंध बनाए रखता है।
यह रणनीतिक स्वायत्तता है।
(3) BRICS और SCO सदस्यता
भारत पश्चिमी ब्लॉक और रूस-चीन ब्लॉक दोनों में सक्रिय है।
यह स्पष्ट रूप से बहु-संतुलन कूटनीति है।
3. पड़ोसी प्रथम नीति (Neighbourhood First)
नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, श्रीलंका आदि देशों के साथ संबंधों को मजबूत करना—
यह समुद्रगुप्त की सीमांत नीति की आधुनिक झलक है।
4: तुलनात्मक विश्लेषण
अब UPSC शैली में तुलना करें:
| आधार | समुद्रगुप्त | आधुनिक भारत |
|---|---|---|
| शासन प्रणाली | राजतंत्र | लोकतंत्र |
| शक्ति का प्रयोग | सैन्य विजय | कूटनीति + आर्थिक शक्ति |
| बफर राज्य | सीमांत राज्य | नेपाल, भूटान |
| संतुलन | साम्राज्य विस्तार | बहुध्रुवीय संतुलन |
| उद्देश्य | साम्राज्यिक प्रभुत्व | राष्ट्रीय हित एवं स्थिरता |
5: समानताएँ
- रणनीतिक लचीलापन
- क्षेत्रानुसार नीति परिवर्तन
- प्रतिद्वंद्वी शक्ति को सीमित करना
- बफर राज्य की अवधारणा
6: भिन्नताएँ
- समुद्रगुप्त का उद्देश्य प्रभुत्व था, आधुनिक भारत का उद्देश्य स्थिरता।
- प्राचीन काल में युद्ध प्रमुख साधन था, आज कूटनीति प्रमुख साधन है।
- आज अंतरराष्ट्रीय कानून और संस्थाएँ मौजूद हैं।
और भी पढ़ें :प्राचीन भारतीय राजा और वर्तमान राजनीतिक नेतृत्व बेहतर कौन है?
8: आलोचनात्मक दृष्टिकोण
क्या समुद्रगुप्त वास्तव में शक्ति संतुलन के समर्थक थे?
या यह साम्राज्य विस्तार का साधन मात्र था?
कुछ इतिहासकार मानते हैं कि यह केंद्रीकृत प्रभुत्व की रणनीति थी, न कि संतुलन की।
इसी प्रकार आधुनिक भारत भी “रणनीतिक स्वायत्तता” के नाम पर अपनी शक्ति बढ़ा रहा है।
9: निष्कर्ष : इतिहास से वर्तमान तक
इतिहास केवल अतीत नहीं है—
यह वर्तमान की नीति का आधार है।
समुद्रगुप्त ने जिस प्रकार शक्ति, कूटनीति और सामरिक संतुलन का उपयोग किया, उसी प्रकार आज भारत बहुध्रुवीय विश्व में संतुलन बना रहा है।
अंतर केवल साधनों का है।
सिद्धांत आज भी वही है।
अंतिम पंक्तियाँ
समुद्रगुप्त की तलवार और आधुनिक भारत की कूटनीति—
दोनों का लक्ष्य एक ही रहा है—
राष्ट्रीय हित की रक्षा और शक्ति का संतुलन।
इतिहास हमें सिखाता है कि शक्ति केवल बल में नहीं,
बल्कि संतुलन में है।
डिस्क्लेमर (Disclaimer)
यह लेख शैक्षिक एवं विश्लेषणात्मक उद्देश्यों के लिए तैयार किया गया है। इसमें प्रस्तुत विचार ऐतिहासिक स्रोतों, अंतरराष्ट्रीय संबंध सिद्धांतों तथा समकालीन नीतिगत विश्लेषण पर आधारित हैं। इसका उद्देश्य किसी भी राजनीतिक दल, सरकार या व्यक्ति विशेष का समर्थन या विरोध करना नहीं है। लेख में की गई तुलनाएँ केवल शैक्षणिक समझ विकसित करने के लिए हैं, न कि प्रत्यक्ष ऐतिहासिक समानता स्थापित करने के लिए। पाठकों से अपेक्षा है कि वे विषय को अकादमिक दृष्टिकोण से ग्रहण करें।

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